Monday, August 17, 2009

मन क गप्प..मन में

कतेक रास बात मन में पड़ल रहि जाए छै,
हम अपने में फंसल रहि जाए छी.
और कतेक रास बात मन में पड़ल रहि जाए छै।

हम अपना सं निकलबाक लेल छटपटाइत रहैत छी
और हमर मन हमारा खेदाड़ेत रहेये..
कि आदमी अपन अंदर क आदमी क
बाहर नहीं निकालते..
कि हम सब बाहर दुनिया में अपना क उलझा क रखने रहबे..
हम कि करबे, कि अपन गप्प बाहर निकाल पाबि
कि, कतेक रास बात क कतेक रास लोग कहि सकी...

Thursday, February 12, 2009

इ दिल्ली छिए बाबू........

लगभग पांच बरख भ गेल दिल्ली में। पढ़े लेल एलों और दिल्ली में बेस जकां गेलों। कतेक बेर भेल जखेन लागल इ शहर मन में जगह ने बना रहेल अछि। लेकिन ओते बेर इहो सोचलों कि आय जे छी एकरा में इ शहर क सेहो योगदान छे।


घर से जखेन निकले छी मन में कतेक गप्प धमाल मचब लगेए, जेना जखैन आएल रहों पहिल बेर दिल्ली त केहेन रहों। हमरा जेना बदेल देलक इ दिल्ली। कॉलेज फेर नौकरी ॥। फेर एकटा प्रवासी मैथिल जकां सोचे लेल इ शहर कतेक बेर समय देलक।


कहियो इ शहर क उत्तर में रहलों त कहियो पश्चिम और आब दक्षिण में। भीड़ वाला इ शहर क भोर और सांझ क पढ़े क कोशिश में समय गुजरेत जा रहेल अछि और हम एकरा में बसेत जा रहल छी। रोड पर लाल बत्ती और हरियर बत्ती क चुपचाप कहियो ने देखेलिए, सत्य कहे छी भाय। मोन पारेत छी, जखेन नई दिल्ली स्टेशन पर उतरल रहों, कॉलेज में पहिल साल। सब किछु नब लगे रहे, भीड़ बला बस में बैठे काल जेना डर लगे रहे और आए सब किछ अपन लगेत अछि, केना कहिए कि इ शहर अजनबी छी हमरा लेल।


प्रवासी कहियो ने बुझलक इ दिल्ली हमरा और हम जेना एकरा अपन मुंहलगा यार बना लेलिए। दिल्ली विश्वविद्यालय क मुख्य द्वार पर ठार भ क कहियो ने लागल की हम अपन गाम में ने छी, ओहेना हंसेत, ठहाका लगबेत दोस्त, बस अंतर एतबे कि एतुका ड्रेस हमर गाम में लोग ने फेहरेत छै, बांकी त ने कोनो अंतर। साल दर साल एतो रमेत दोस्त क देखेत अनुभव करे छी कि अहिना त गाम में लोग सब अपन खेत में काज में डूबल रहेत छे।


शहर क आपाधापी में कतैक बेर मन उचेट सेहो गेल लेकिन ओतबे देर में मन शांत करबाक शक्ति सेहो शहर दिल्ली में छै।

मैथिली मे कोशिश क रहल छी ...कहब जरूर ,,,,

Tuesday, December 9, 2008

हिदुस्तान में चर्चा हमार हिन्दी ब्लॉग अनुभव क

हिदुस्तान में चर्चा हिन्दी ब्लॉग अनुभव क

Saturday, October 25, 2008

कहबाक कला होइ छई- अविनाश

अविनाश कवि छैथ...इ कविता साहित्य अकादमी में मैथिली कार्यक्रम में सुनेने रहैथ।
आए अहुं सब पढ़ू, अविनाश त आब भोपाल में छैथ, बड़ मोन पड़ैत छैथ। चलू कविता क अंदर आउ ॥हमर संग॥

कहबाक कला होइ छई

हिसाब-दौड़ी कहियो ने भेल
आंगुरक बीच मे भूर अछि
जे अरजल सभटा राइ-छित्ती भेल
छिपली मे बांचल कनखूर अछि
हमर गाम मे छल एकटा
कहैत छल,
अरजबाक कला होइ छई
जेना बिदापति मंच सं कहय छथिन कमलाकांत
कहबाक कला होइ छई
कलाजीवी झाजी आ कलाजीवी कर्णजी!
कलाजीवी हुकुमदेव आ कलाजीवी फातमी!
बाढ़ि मे दहा गेलनि जिनकर गाम
सुन्न छैन्ह जिनकर
गुम्म छैन्ह मुह मे बकार
नचारी मे नहि ल' पओता
केओ उद्-घाटन बाती जरओता
केओ देता अध्यक्षीय
जाड़-बसात मे चमक चांदनी देखि
दुखित जन पीयर पुरान कागत पर लिखबे टा करत,
मुह के सी'बाक कला होइ छई
कतबो कहथु कमलाकांत
सुनबाक कला होइ छई
हल्ला-गुल्ला जुनि मचाउ बाउ
छी संस्कारी लोक
कहबाक कला होइ छई!

Saturday, February 16, 2008

कि कहब हे सखि रातुक

बहुत दिनक बाद टोला पर गप्प करे ल आएल छी, मुदा विद्यापति का संग ल के ......

कि कहब हे सखि रातुक .......बात । आनंद लेल जाए ।

गिरीन्द्र .


कि कहब हे सखि रातुक बात।

मानक पइल कुबानिक हाथ।।

काच कंचन नहि जानय मूल।

गुंजा रतन करय समतूल।।

जे किछु कभु नहि कला रस जान।

नीर खीर दुहु करय समान।।

तन्हि सएँ कइसन पिरिति रसाल।

बानर-कंठ कि सोतिय माल।।

भनइ विद्यापति एह रस जान।

बानर-मुह कि सोभय पान।।

Friday, August 3, 2007

दिमाग चटाऊ गप्प पर टोला में चर्चा शुरू भ रहल छै.....

काज करैत काल पता नै , दिमाग कत चल जायत छै. पता करैत छी त दिमाग सेहो हीरो बैन जाएत अछि. इ दिमाग होते छै अहिना.
पता करै छी कि कारण की छै.....

दिमागी कसरत करबाक इच्छा हुए त नौकरी करू..

हमर अधिकतर दोस्त इ गप्प कहैत अछि....

हमरो हाल आजु अहिना अछि...आफिस मे मन ने लागल..त रिपोर्टिंग में गेलों....
लेकिन इ कि ......मन लगतै ने अछि//////

मन पर आधारित अहिना दिमाग चटाऊ गप्प पर टोला में चर्चा शुरू भ रहल छै.....
अहुं सब आऊ.......

Friday, June 15, 2007

दुमका में झुमका हैरोलनि काशी में कनबाली


एकटा प्रेयस के मन में अपन प्रेयसीक लेल प्रेमक जे तरंगित रंग सम्मुख अबैछ, बिल्कुल अपूर्व रुप में दृष्टिगोचर अछि। ओ यथावत् छथिन्ह वा सही में किछु हरौलन्हि ई त हुनके पता छन्हि मुदा एहि ठाम लगैत अछि जे सभ के अपन नयन-कमान सँ घायल करय वाली आओर दोसर के मन हरब' वाली के अपने की की नहि हरा गेलन्हि- झुमका, कनबाली,.....एत तक कि ठोरक लाली सेहो......हद त तब भेल जे प्रणय-रंग सँ रंगल हुनकर ओढ़नी प हम की, कौओ मिट गेल आ ल' क' भागि गेल दरभंगा टावर प.........आह अति मधुरगर एहि गीत के पढ़ला पर बुझाइत अछि जे शृंगार रसक शिरोमणि विद्यापतिक भूमि पर एखनों प्रणय रस सँ सराबोर फुहारक सदिखन बरसैत रहैत अछि।



दुमका में झुमका हैरोलनि काशी में कनबाली
हम पुछलियनि के चुरौलक अहांक ठोरक लाली
हुनकर नथिया बरामद भेल हमरा रंगीला जिला बलिया में-2
मुंह हुनक पूर्णिमाक चंदा - 2
कोन मनुक्ख सं परलनि फंदा
जौ कियो केलखिन हुनकर निंदा -2
तिनका ओ केलखिन शर्मिन्दा
नैन हुनक दुइधारी खंजर
यवनक भार अपार
पटना सन शहर में हरौलनि ओ नौलखा हार
हुनकर बाली बरामद भेल कि हमरा कि मुशरी घरारी में..............
दुमका में झुमका हैरोलनि काशी में कनबाली
हम पुछलियनि के चुरौलक अहांक ठोरक लाली
हुनकर नथिया बरामद भेल हमरा रंगीला जिला बलिया में-2..................

रोज लिपिस्टिक चाहबे करियनि-2
रुबिया वायल पहिनबे करथिन्ह
चाहे लोक जतेक घायल हो-2
ओ नहि अप्पन चाल बदलती
पान दबौने गाल में हरदम
चप्पल हिल छैन चारि-2
जे कियो हुनका किछु कहती ओ मारती नैनक वाण
हुनकर ओढनि लय भागि गेल कौवा शहर दरभंगा में........
दुमका में झुमका हैरोलनि काशी में कनबाली
हम पुछलियनि के चुरौलक अहांक ठोरक लाली
हुनकर नथिया बरामद भेल हमरा रंगीला जिला बलिया में-2............